बादल फटा, ग्लेशियर टूटा या कोई और वजह? जानें, कहां-कहां जुड़ रहे धराली में मची तबाही के तार
रिपोर्ट: DailySmachar टीम | तारीख: 6 अगस्त 2025
धराली में तबाही: एक प्राकृतिक आपदा या चेतावनी?
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली क्षेत्र में 4 अगस्त 2025 की रात आई प्राकृतिक आपदा ने पूरे इलाके को दहला दिया। कई मकान मलबे में दब गए, पुल बह गए और कई लोगों की जान चली गई। प्रशासन और आपदा राहत टीमें अभी भी राहत और बचाव कार्यों में जुटी हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस तबाही की असली वजह क्या थी? क्या यह बादल फटने का परिणाम था, या ग्लेशियर टूटने से आई विनाशलीला? आइए, घटनास्थल, वैज्ञानिक रिपोर्ट्स और चश्मदीदों की बातों से समझते हैं इस त्रासदी की परतें।
क्या हुआ धराली में?
- रात 2:15 बजे अचानक तेज आवाज और जलप्रवाह की आवाज सुनाई दी।
- स्थानीय लोगों ने पहले पहाड़ दरकने की आवाज सुनी, फिर अचानक नदी का जलस्तर बढ़ गया।
- धराली और उसके आसपास के गांवों में भारी तबाही हुई – 12 लोगों की मृत्यु की पुष्टि, 30 से अधिक लापता।
- राणाचट्टी पुल पूरी तरह बह गया, जिससे गंगोत्री मार्ग पूरी तरह से अवरुद्ध हो गया।
संभावित कारण 1: क्या बादल फटा?
स्थानीय मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, 4 अगस्त की रात धराली क्षेत्र में मात्र 42 मिमी वर्षा दर्ज की गई थी। हालांकि इतनी बारिश आमतौर पर “बादल फटना” की परिभाषा में नहीं आती, लेकिन एक सीमित दायरे में अत्यधिक वर्षा हुई थी जो बादल फटने की स्थानीय घटना मानी जा सकती है।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि वायुमंडलीय अस्थिरता और स्थानीय ह्यूमिडिटी की वजह से यह एक माइक्रो-क्लाउडबर्स्ट घटना हो सकती है।
संभावित कारण 2: क्या ग्लेशियर टूटा?
उत्तराखंड स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने एक प्रीलिमिनरी सैटेलाइट इमेज विश्लेषण में पाया कि धराली के पास स्थित एक छोटा ग्लेशियर 4 अगस्त की सुबह टूट सकता है, जिससे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी स्थिति बनी। इस फ्लड के कारण ही पानी और मलबा तेजी से नीचे आया और भारी तबाही मच गई।
ग्लेशियर से टूटकर आया पानी, अपने साथ चट्टानों और पेड़ों को बहा लाया, जिससे तबाही की रफ्तार और तीव्रता बढ़ी।
संभावित कारण 3: क्या यह मानवजनित आपदा है?
विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि धराली और आसपास के क्षेत्रों में अवैज्ञानिक निर्माण, रोड कटिंग, और टनलिंग जैसे भारी निर्माण कार्यों ने पर्यावरण को असंतुलित कर दिया है। जिस प्रकार हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और चारधाम सड़क परियोजना चल रही है, उससे भूगर्भीय अस्थिरता बढ़ी है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि इलाके में पेड़ काटे जाने से मिट्टी की पकड़ कम हो गई, जिससे लैंडस्लाइड्स का खतरा बढ़ा।
चश्मदीदों की आंखों देखी
“हमने अचानक देखा कि पहाड़ से तेज आवाज आई, फिर पानी और मलबा गांव की ओर दौड़ पड़ा। हमारा घर 10 मिनट में बह गया।” – रमेश नेगी, धराली निवासी।
“सरकार को पहले ही चेतावनी दी गई थी कि यहां खतरा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।” – सविता देवी, पर्यावरण कार्यकर्ता।
सरकारी प्रतिक्रिया और राहत कार्य
उत्तराखंड सरकार ने त्वरित जांच के आदेश दे दिए हैं। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना के जवान राहत कार्य में लगे हुए हैं।
- स्थानीय प्रशासन ने 10 गांवों को अस्थायी शिविरों में स्थानांतरित किया।
- हेलिकॉप्टर से राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है।
- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ितों को ₹4 लाख मुआवजा देने की घोषणा की है।
विज्ञान क्या कहता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और उनकी अस्थिरता बढ़ रही है। इसके साथ ही, मानसून में आई अनियमितता और अत्यधिक वर्षा का एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। धराली की घटना इसी कड़ी का हिस्सा हो सकती है।
भविष्य की चेतावनी
धराली जैसी घटनाएं यह संकेत हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में बिना पर्यावरण अध्ययन के किए जा रहे विकास कार्य और अनियंत्रित पर्यटन किस प्रकार से खतरनाक हो सकते हैं। यदि हमने अब भी सतर्कता नहीं बरती, तो ऐसी आपदाएं बार-बार दोहराई जाएंगी।
निष्कर्ष
धराली की तबाही ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि विकास की दौड़ में हम कहीं पर्यावरण को अनदेखा तो नहीं कर रहे? क्या सरकारों और जनता को अब और अधिक संवेदनशील होकर काम करने की जरूरत नहीं है?
इस घटना की जड़ में चाहे बादल फटना हो, ग्लेशियर टूटना हो या मानवीय लापरवाही — हमें सबक लेना ही होगा।
धराली आपदा 2025
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